एक वक़्त था जब ओखला मक़ामी सियासत और एक्टीविज़्म के लिए कम, नेशनल पोलिटिक्स के लिए ज़्यादा जाना जाता था। और इसकी वजह भी थी। और वह यह कि यहां मुसलमानों की तक़रीबन तमाम ही बड़ी तंज़ीमों के दफ्तर हैं और मुल्कगीर सतह के दानिश्वर, उलेमा और क़ौमी लीडर यहां बसे हुए हैं। इस सूरते हाल की वजह से ओखला से मुल्कगीर मसलों पर क़यादत मिलती रही है। और आज भी मिल रही है और ओखला को इस पर फ़ख्र करना चाहिये।

मगर इस सूरते हाल का नतीजा यह निकला है कि ओखला की अपनी आबादी किसी क़यादत से तक़रीबन महरूम रही है। यहां जो भी बासलाहिय्यत नवजवान उभरता है उसे फौरन क़ौमी सतह के काम का प्लेटफार्म मिल जाता है। तक़रीबन तमाम बड़े इश्यूज़ पर चाहे जंतर मंतर पर धरना हो या किसी और सूबे के कमज़ोर तबक़े या मुसलमानों के मसाइल हों, ओखला से एक बड़ी तादाद उनमें पेश पेश रहती है। ओखला के नवजवान क़ौमी सतह की तंज़ीमों के केडर तो बने मगर आमतौर पर ओखला उनके फ़ैज से महरूम रहा।

शायद यही वजह थी कि लोकल सियासत में उभरने के लिए इतना काफी होता था कि कोई ईद मुबारक के बड़े बड़े होर्डिंग लगा कर जाना माना नाम बन जाए। कई दफा तो होर्डिंग में कई-कई नाम होते जिनसे एक ग्रुप का अहसास होता था। मगर किसी लोकल समाजी या सियासी इश्यू पर उनका कोई रोल नदारद होता। फिर बिजली सप्लाई की नाकामी पर एहतजाज करने वाले या पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ़ उठने वाले उभरने लगे। पिछले एक चुनाव में तो एक साहब ऐसे भी खड़े थे जिनकी कुल जमा पूंजी यह थी कि उन्होंने ओखला में तीन हज़ार से ज़्यादा लोगों की पासपोर्ट इन्क्वायरी की थी और उन्होंने इसे अपने पब्लिक रिलेशन के लिए काफी समझा। स्टूडेंट पोलिटिक्स में नाम भी उरूज का एक तरीक़ा रहा है।

मगर पिछले तीन सालों से हालात में कुछ तब्दीली आई है। अब लोकल सतह के काम या उनमें नाकामी सियासी मुद्दा बनने लगे हैं। करप्शन के खिलाफ़ क़ौमी बेदारी और आम आदमी पार्टी के उरूज ने ओखला में कई एक्टीविस्ट पैदा किये। वालंटियर्स ऑफ चेंज की कोशिशों से वोटर बेदारी, जनता के मुद्दे, जनता का बजट, चुनावी बहस और लोकल मेनीफेस्टो के चलन की वजह से लोकल सियासत को एक रुख़ मिला।

ओखला को अगर तरक़्क़ी करना है तो यहां की बदहाली को यहां की सियासत का मरकज़ बनना चाहिये। और इसके लिए लोगों को जज़्बाती इश्यूज़ से हटकर ज़मीनी मुद्दों पर ज़ोर देना चाहिये। जो ओखला मुल्क भर में कहीं कोई ज़ुल्म हो तो उसके ख़िलाफ़ उठ खड़ा होता है और आवाज़ उठाता है, वही ख़ुद पर जारी सियासी और इंतेज़ामी ज़ुल्म पर तक़रीबन ख़ामोश नज़र आता है।

यहां काम करने के लिए कई मुद्दे हिमायत के मोहताज हैं। गंदगी और टूटी सड़कें, सड़कों पर नाजायज़ क़ब्ज़े, पोल्यूशन, पार्किंग, रोड़ जाम, पब्लिक पार्क की कमी, उभरते जराइम, नशा, दस साल से संगे बुनियाद के बावजूद 300 बेड के हास्पीटल के लिए एक ईंट का भी न रखा जाना, ओखला-रिंगरोड़ लिंक रोड़ का दो दहाई से बनने का इंतज़ार, अच्छे स्कूलों की कमी, बेरोज़गारी, यमुना और ओखला केनाल की सफाई, वग़ैरह ऐसे दसियों मुद्दे हैं जिन पर लोगों की समझ बढ़ा कर उन्हें सियासी मुद्दों में बदलने की ज़रूरत है।

ओखला में एक नई सियासी क़यादत उभरनी चाहिये जिसका मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ ओखला की तरक़्क़ी हो। ओखला की अवाम का भला इसी में है कि यहां सियासत बराये सियासत, सियासत बराये मुख़ालफत और सियासत बराये इलाक़ाइयत या बिरादरी और सियासत बराये ज़ाती उरूज के बजाए *”सियासत बराये ओखला”* की फिज़ा हमवार हो। और इसके लिए ऐसे संजीदा लोगों को आगे आना होगा जो ख़ुद को एक बेहतर इलाक़े का निवासी बताने में फ़ख्र महसूस करना चाहते हों या अपनी आने वाली नस्लों को एक बेहतर ओखला विरासत में देना चाहते हों।

अब्दुल रशीद अगवान

 

By VOC

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