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यह घर मांगे ‘मोर’

एक वक़्त था जब ओखला मक़ामी सियासत और एक्टीविज़्म के लिए कम, नेशनल पोलिटिक्स के लिए ज़्यादा जाना जाता था।…

ओखला ही क्यों?

*जो हम ख़ामोश बैठेंगे तो कोसेंगी नई नस्लें,* *निज़ामे गुलसितां यारो हमीं को तो बदलना है!!* जब हम ओखला के…