*जो हम ख़ामोश बैठेंगे तो कोसेंगी नई नस्लें,*
*निज़ामे गुलसितां यारो हमीं को तो बदलना है!!*

जब हम ओखला के मसाइल की बात करते हैं तो लोग पूछते हैं कि क्या सीरिया, मुज़फ्फरनगर, गोधरा, पर्सनल लॉ, मसलकी झगड़े, फिरक़ापरस्की, वग़ैरह मुद्दे नहीं हैं? यक़ीनन ये भी वक़्त के अहम मुद्दे हैं। मगर ओखला के लोग इन मुद्दों पर आवाज़ तो उठा सकते हैं, उनपर असरअंदाज़ नहीं हो सकते। हालात पर हमारी मालूमात के लिए दूसरे ज़रिये काफी हैं। *वॉलंटीयर्स ऑफ चेंज* में उनपर बात करके हम कोई अनोखा काम नहीं करेंगे और बहुत से लोग और तंज़ीमें उन मुद्दों पर काम कर ही रहे हैं, इसलिए उन्हें दोहराने से क्या फायदा?

ओखला के मसाइल पर बात करना और उनपर अमल के लिए कोशिश करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यहां के हालात हमारी और हमारी नस्लों की ज़िंदगी को सीधे तौर पर मुतास्सिर करते हैं और अगर हम चाहें तो उनको बदल भी सकते हैं।

ओखला हमें मौक़े देता है। अगर हम किसी आइडियल समाज की बात करते हैं तो हमारे पास एक बस्ती है जिसे हम हर लिहाज़ से आइडियल बना सकते हैं। अगर हम दुनिया में ज़ुल्म का ख़ात्मा चाहते हैं तो ओखला में हर तरह का ज़ुल्म किसी न किसी शक्ल में मौजूद है उसके ख़िलाफ जद्दोजहद से शायद हम कुछ सीख सकें और बड़े केनवास के लिए ख़ुद को तैयार कर सकें। जो ज़ुल्म के ख़िलाफ छोटी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार नहीं उसका बड़ी लड़ाई में हिस्सेदारी का दावा महज़ लाहासिल दावा ही रहेगा।

कहा जाता है कि *चेरिटी बिगिन्स एट होम* यानि भलाई अपने घर से शुरू होती है। जो ख़ुद का ख़ैरख़्वाह नहीं वो किसी का ख़ैरख़्वाह नहीं। सीरिया या यूपी के हालात को बदलने की ज़िम्मेदारी शायद हम पर उस तरह नहीं है, जितनी कि हमारे अपने इलाक़े को बदलने की।

क्या ओखला में सबकुछ ठीक है? क्या यहां ज़ुल्म नहीं है? क्या यहां तालीमी पसमांदगी नहीं है? क्या यहां मसलकी झगड़े नहीं हैै? क्या यहां अवाम का सयासी इस्तहसाल नहीं है? क्या यहां माहौलयाती बोहरान नहीं है? क्या यहां बच्चों की सही परवरिश का मसला नहीं है? क्या यहां नशा और जिस्मफरोशी के निशान नहीं पाये जाते? क्या यहां लीडरशिप क्राइसिस नहीं है? क्या यहां नवजवानों की बड़ी तादाद रहनुमाई की मुंतज़र नहीं है? क्या यहां सफाई सुथराई और सीविक लाइफ के मसाइल नहीं हैं? अगर ये अनगिनत मसले यहां पर मौजूद हैं तो हमारे सिवा कौन उनको हल करेगा?

सपने मातम के लिए नहीं होते उनको यक़ीनी बनाने के लिए होते हैं। हम अपने सपनों को छोटी छोटी कोशिशों से साकार कर सकते हैं। छोटे छोटे बदलाव ही बड़े बदलाव की नींव होते हैं। एक एक ईंट को जमा करके और एक एक ईंट को जोड़कर ही मकान बनाया जा सकता है।

आओ, हम अपने घर को बेहतर करने की कोशिश करें।! ओखला के अपने घर से भलाई के फरोग़ की जद्दोजहद का हिस्सा बनें!! आओ, ओखला को एक बेहतर ज़िंदगी का नमूना बनाएं!!!

*अब्दुल रशीद अगवान*
कन्वीनर, वॉलंटीयर्स ऑफ चेंज

By VOC

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